भक्ति से मोक्ष की यात्रा, यमुनोत्री धाम से शुरु होती है
लेखक डॉ़. बृजेश सती चार धाम महासभा के महासचिव हैं।

अनादिकाल से मोक्ष और वानप्रस्थ का मार्ग मानी जाने वाली चार धाम यात्रा अब अपने नए स्वरूप में है। एक दौर ऐसा था, जब यात्री जीवन के अंतिम पड़ाव में इन धामों में आता था। पहाड़ी दुर्गम रास्तों से सुगम सुविधाओं तक के इस सफर में, अब हर पीढ़ी की आस्था देवभूमि के इन चार पवित्र धामों में उमड़ रही है।
उत्तराखंड स्थित चार प्रसिद्ध धामों में यमुनोत्री पहला धाम है। धाम दर्शन की शुरुआत यहां से होती है। यहां वामावर्त यात्रा का माहात्म्य है। यमुनाजी के दर्शन से भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। शास्त्रों में मां यमुना को भक्ति और मुक्ति प्रदायिनी कहा गया है। गंगाजी के दर्शन से ज्ञान मार्ग, केदारनाथ दर्शन से वैराग्य और बदरीनाथ धाम में नारायण के दर्शन से मानव को सांसारिक मोह माया से मुक्ति मिलकर मोक्ष मिलता है।
हिमालय में प्रवाहित होने वाली नदियों का धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। ये महज नदी नहीं, बल्कि करोडों श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा का केन्द्र हैं। सदा नीरा नदियां हमारी सभ्यता और संस्कृति की आधार हैं। हिमालय के शिखरों से प्रभावित होने वाली इन नदियों का उल्लेख पुराणों से लेकर आधुनिक साहित्य में विस्तार से किया गया है।
यमुनोत्री धाम है तीर्थ यात्रा का पहला पड़ाव
हिमालय के पश्चिम में स्थित यमुनोत्री धाम, चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। यह उत्तरकाशी जिले की बडकोट तहसील में स्थित है।
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समुद्र की गहराई से दस हजार फीट की ऊंचाई पर यमुनाजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां दर्शन और पूजन कर मनुष्य मोक्ष की कामना करता है। यमुनाजी का बाहन कछुआ है। जो संयम का प्रतीक माना जाता है।
प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों में इस धाम का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसको पतितपावनी माना जाता है। मनुष्य जीवन का उद्देश्य, इंद्रियों पर संयम और पवित्रता के साथ कल्याण मार्ग पर प्रशस्त होकर परमात्मा में विलीन होना है।
बंदर पुंछ पर्वत है उदगम स्थल
बंदरपुंछ पर्वत के एक भाग को कलिन्द कहते है। माँ यमुना का उद्गम स्थल होने के कारण इसका नाम कालिन्दी पड़ा। यमुनोत्री का मंदिर यमुना नदी के बायें तट पर कालिन्द पर्वत की तलहटी में स्थित है।
यह वह स्थान है, जहाँ यमुना पृथ्वी को स्पर्श करती है। दरअसल यमुना का उद्गम स्थान बर्फ से जमी एक झील तथा कालिन्द ग्लेशियर है। जो यमुनोत्री से कुछ किमी ऊपर की ओर समुद्र की गहराई से चार हजार मीटर की ऊँचाई पर है। यमुनाजी को दो रूपों, प्राकृतिक नदी और मंदिर में विग्रह के रूप में पूजा जाता है।
ऋषि मुनियों की तप स्थली है यमुनोत्री
हिन्दू धर्म ग्रन्थों एवं पुराणों में यमुनोत्री का विशेष स्थान है। यह स्थान ऋषि मुनियों की तप स्थली है। यमुनाजी, यमराज की बहन, भगवान सूर्य की पुत्री और भगवान कृष्ण की रानियों में एक हैं। इन्हें कालिन्दी भी कहा जाता है। यहाँ पर यमुनाजी ने तपस्या की । उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें दर्शन दिया।
जनश्रुति के अनुसार महर्षि असित ने इस स्थान की खोज कर यहाँ पर अपना आश्रम बनाया। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन इस स्थान में रहकर तप में लीन रह कर व्यतीत किया। यहां पर यमुना जी की तपस्या सौभरी, मान्धाता आदि ऋषियों ने की थी।
यमुनोत्री धाम का माहात्म्य
स्कंद पुराण के अनुसार यहां पर यमुना के अवतार से पूर्व अग्नि ने कठोर तपस्या की। तपस्या के फलस्वरूप अग्नि को दिक्पाल पद मिला। यहीं पर सप्त कुण्ड नामक सरोवर अग्नि के प्रतीक रूप में प्रकट हुआ। इस सरोवर को गोरख डिविया कहते हैं। यहां सिद्ध नामक तीर्थ है। जहां यमराज ने तप किया और लोकपाल का पद पाया।
कूर्म पुराण की ब्राही संहिता में यमुना का उल्लेख है। यमुना जी, भगवान श्री कृष्ण की चतुर्थ पटरानी हैं। जो कालिंदी के नाम से विख्यात है। कालिंद पर्वत की पुत्री है।
सूर्य पुत्री यमुना तीनों लोकों में विख्यात है। यमुनाजी में स्नान करने से पापों से मुक्ति और पान करने से सात कुलों का उद्धार होता है।
शास्त्रों में ऐसा बताया गया है कि यमुना जी की जल में स्नान करने से मनुष्य यम पाश से मुक्त हो जाता है।
मंदिर की समीप एक दिव्य कुंड है। इस कुंड का जल अत्यंत गरम है। इसके स्पर्श से संपूर्ण पापों का नाश होता है। इस कुंड में कपड़े में चावल बांध के डालने से श्रद्धालुओं को पके चावल प्रसाद स्वरूप दिया जाता है।
यमुनोत्री मंदिर के रावल पुरुषोत्तम उनियाल बताते हैं कि यमुनोत्री धाम में नवग्रह पूज्य माने जाते हैं । सूर्य और शनि सहित सभी नव ग्रह अनुकुल फल देते हैं। यहां पर नव ग्रह पूजन का विशेष माहात्म्य है।
यमुनोत्री मंदिर के पुजारी हैं उनियाल ब्राह्मण
यमुनोत्री मंदिर के मुख्य पुजारी और धाम के तीर्थ पुरोहित उनियाल जाति के ब्राह्मण हैं। ये खरसाली गांव के स्थानीय निवासी हैं। दो थोकों के 12 पुजारी प्रतिवर्ष चक्रनुसार पूजा के लिए नामित किए जाते हैं। मंदिर का संचालन एवं प्रबंधन श्री यमुनोत्री मंदिर समिति करती है।
अक्षय तृतीया तिथि को खुलते हैं मंदिर के कपाट
वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। इसे आखा तीज भी कहते हैं। यह दिन मांगलिक कार्यों के लिए शुभ माना गया है। इस दिन उत्तराखंड के चार धामों में दो धाम यमुनोत्री और गंगोत्री मंदिर के कपाट ग्रीष्मकाल के लिए खोले जाते हैं।
इस वर्ष यमुनोत्री मंदिर के कपाट 19 अप्रैल को 12:35 पर श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाएंगे। यमुना जी की भोग मूर्ति, सोमेश्वर और शनि महाराज की अगवाई में प्रातः 8 बजे खरसाली से यमुनोत्री धाम के लिए प्रस्थान करेगी।
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