आदि शंकराचार्य के जन्म की आध्यात्मिक कथा
शंकरो शंकर: साक्षात ...अर्थात शंकराचार्य साक्षात शंकर भगवान हैं।
आदि शंकराचार्य की जयंती के अवसर पर सनातन संवाद आपके लिए शंकराचार्य भगवान के जन्म की प्रामाणिक जानकारी लेकर आया है। सामान्यत: सभी सनातन प्रेमियों को यह पता है कि शंकराचार्य का जन्म केरल के कालणी ग्राम में हुआ था। शंकराचार्य के माता और पिता का नाम आर्याम्बा और शिवगुरु था और उनका जन्म नम्बूदरीपात ब्राह्मण कुल में हुआ था।
परन्तु आज हम जिस कथा को आपके सामने रख रहे हैं वह शंकराचार्य के जन्म से पूर्व देवताओं और भगवान शिव की वार्ता का अंश है। इसी वार्ता में भगवान शिव ने शंकराचार्य के रूप में अवतार लेकर धर्म संस्थापना का आश्वासन देवताओं को दिया था। यह कथा अंश श्रीविद्यारण्य विरचित श्रीशंकरदिग्विजय: ग्रन्थ से हम आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं।
कथानक है कि सभी देवता देवाधिदेव महादेव के पास पहुंचे और प्रार्थना की कि वैदिक मार्ग के संरक्षण हेतु आप कृपा करें क्योंकि इसका ह्रास हो रहा है। तब भगवान शंकर ने देवताओं से कहा:-
इत्युक्त्वोतपरतान् देवानुवाच गिरिजाप्रिय:।
मनोरथं पूरयिष्ये मानुष्यमवलम्ब्य व: ।।
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देवताओं की प्रार्थना को सुनकर गिरिजाप्रिय भगवान शंकर ने कहा कि ‘मैं मनुष्य शरीर धारण करके आप लोगों की कामनाओं को पूर्ण करूंगा’
दुष्टाचारविनाशाय धर्मसंस्थापनाय च।
भाष्यं कुर्वन्ब्रह्मसूत्रतात्पर्यार्थविनिर्णयम्।।
भगवान शंकर ने कहा कि दुष्ट आचरणों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना के लिए, ब्रह्मसूत्रों के तात्पर्य का निर्णय करने वाले भाष्य की रचना के लिए अवतार लूंगा।
यतीन्द्र: शंकरो नाम्ना भविष्यामि महीतले।
मद्वतथा भवन्तोपि मानुषीं तनुमाश्रिता।।
तं मामनुसरिष्यन्ति सर्वे त्रिदिववासिन:।
तदा मनोरथ: पूर्णो भवतां स्यान्न संशय:।।
भगवान शंकर ने कहा कि अपने चार शिष्यों के साथ मैं यतीश्वर शंकराचार्य के नाम से अवतीर्ण होउंगा। मेरे समान ही आप सभी देवता भी मानव शरीर धारण करके यदि मेरा अनुसरण करेंगे तब निश्चित रूप से आप लोगों का मनोरथ पूर्ण होगा।
भगवान शंकर के इसी संवाद के बाद आदि शंकराचार्य के अवतार की भूमिका बनी। भगवान ने अवतार लिया और 32 वर्ष की अल्पायु में ही सनातन धर्म की ध्वजा को दिग्विजय यात्रा के माध्यम से सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर दिया।
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