गीता माहात्म्य

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Published On December 1st, 2025 10:30 pm (Updated On December 1, 2025)

गीताशास्त्रमिदं पुण्यं य: पठेत्प्रयत: पुमान्।

विष्णो: पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जित: ।।

जो मनुष्य इस पुण्यमयी गीताशास्त्र का पाठ करता है वह भगवान विष्णु का आश्रय(कृपा) प्राप्त करता है। वह सभी प्रकार के भय और शोक से मुक्त हो जाता है।

गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च I

नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च II

गीता का पाठ करने और प्राणायाममें तत्पर रहने वाले भक्त के इस जन्म और पूर्वजन्म में किये हुए समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

मलनिर्मोचनं पुंसां जलस्नानं दिने दिने ।

सकृद्गीतामभसि स्नानं संसारमलनाशनम् ॥

जल में प्रतिदिन स्नान करके मनुष्य स्वयं को स्वच्छ कर सकता है। लेकिन भगवद्गीता-रूपी पवित्र गंगा-जल में स्नान जीवन (भवसागर) की मलिनता का नाश कर देता है।

गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रविस्तरैः।

या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिः सृता ॥

भगवद्गीता स्वयं भगवान विष्णु के मुख से प्रगट हुई है। ऐसे में गीता का अध्ययन पूरे मनोयोग से करना चाहिए। गीता पाठ कर लिया तो फिर अन्य किसी शास्त्र को पढ़ने की क्या आवश्यकता।

भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनि: सृतम ।

गीतागङ्गोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ॥

गीता महाभारत का अमृतसार और जो भगवान विष्णु के मुख से निकला है। अत: गीतारूपी गंगाजल को पी लेने के बाद मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता है।

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ।

पार्थो वत्सः सुधीभोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ।।

सभी उपनिषद गाय के समान हैं, गोपालनंदन कृष्ण दुहने वाले और अर्जुन बछड़े के समान हैं और गीता अमृत ही उस गाय का दुग्ध है। श्रेष्ठ बुद्धि वाला मनुष्य ही इसका पान करने वाला है।

एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम् ।
एको देवो देवकीपुत्र एव ।।

एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि।
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ।।

देवकी पुत्र कृष्ण द्वारा कहा गया गीताशास्त्र ही उत्तम शास्त्र है, देवकीपुत्र श्रीकृष्ण ही एक देव हैं, उनका नाम ही एकमात्र मंत्र है और उनकी सेवा ही एकमात्र कर्म है।

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