श्रीविद्या साधना: सरल, सहज,सब के लिए
जगद्गुरु आगमाचार्य तांत्रिक योगी श्री रमेश जी महाराज का लेख

आध्यात्म जगत की और भौतिक जगत की समस्त साधनाओ में अगर कोई सर्वश्रेष्ठ साधना है तो वह श्री विद्या साधना है।
तंत्र की 10 महाविद्याओं में सबसे अधिक साधना पूजा अगर किसी विद्या की होती है, किसी साधना की होती है तो वह है श्री विद्या साधना है। श्री विद्या का साधक चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी को प्राप्त करने के लिए समर्थ बन जाता है। मानव जीवन में अनेक तरह के अभाव हैं जिस कारण उत्साह और उमंग भी जीवन में नहीं रहता। सबसे कठिन और सबसे प्रभावी समस्या इस समय जीवन में मनुष्य के तनाव हैं जो संपूर्ण जीवन को असंतुलित कर देता है और जीवन संतुलन बनाने में ही पूरा हो जाता है।
इस साधना में अष्टांग योग की तरह यम-नियम-आसन-प्राणायाम की भांति शरीर को कष्ट देते हुए अनेकों वर्ष नहीं लगते। यह साधना सुख साधना होती है। सरल-सहज हर व्यक्ति को साधना का अधिकार देते हुए शीघ्र फलदाई होती है।
यह साधना तंत्र की साधना है। तंत्र शीघ्र फल देने वाली विद्या है। जीवन का हर क्षेत्र श्री विद्या से प्रभावित है। विद्या, बुद्धि, यश, समृद्धि, संतान, व्यापार, रोगनाश, अपूर्ण कार्य को पूर्णता, राज दरबार में सम्मान, दैविक भौतिक सुखों के साथ मोक्ष का द्वार खोलती है। श्रीविद्या ही ऐसी सहज साधना है जो श्रद्धा भाव से समर्पित साधक को “त्रिभिर दिवसै त्रिभिर पक्षै त्रिभिर मासै” यानी तीन दिन, तीन पक्ष, तीन माह मेफल प्रदान करने का क्रम प्रारंभ कर देती है। इस साधना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह साधना किसी साधक को किसी प्रकार का दुष्परिणाम नहीं प्राप्त कराती।
साधना गुरु के निर्देशन में प्रारंभ करना चाहिए। आने वाली दीपावली से केवल नवार्ण मंत्र का लवंग(लौंग) से आहुति देते हुए प्रारंभ करें उसके बाद गुरु की शरण में जाइए।
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