भारतीय संस्कृति की आत्मा और आध्यात्म्य की अमूल्य निधि है गंगा

डा. बृजेश सती के द्वारा प्रामाणिक तथ्यों पर विस्तृत लेख

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Published On December 11th, 2025 3:55 pm (Updated On January 3, 2026)

पृथ्वी पर गंगा से बढ़कर कोई अन्य तीर्थ नही माना गया है। भौतिक रूप में प्रत्यक्ष देवता आकाश में सूर्य और धरा पर प्रवाहमान गंगा है। गंगा नदी धरती और स्वर्ग के बीच माध्यम है। गंगा के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। युगों से मां गंगा भू लोक में प्रकृति और प्राणियों की संजीवनी बनकर मानवों के पाप एवं शाप का नाशकर मोक्ष प्रदान कर रही है।
गंगोत्री धाम में समुद्र की गहराई से 10 हजार फीट की ऊंचाई पर मां गंगा का दिव्य और भव्य मंदिर है। यहां प्रति वर्ष अक्षय तृतीया के दिन मंदिर के कपाट खुलते हैं और गोवर्धन पूजा के दिन बंद किए जाते हैं।
गंगा मात्र नदी नहीं, बल्कि आध्यात्म्य की अमूल्य निधि है। गंगा के पावन तट पर ही वैदिक सभ्यता और संस्कृति का उदभव हुआ है। समस्त वेद पुराण और साहित्य का सृजन गंगा के आंचल में हुआ। इसलिए गंगा को ज्ञान गंगा की संज्ञा दी गई है।
आइए जानते हैं गंगा के धरा पर अवतरण की कथा, माहात्म्य और इससे जुडे महत्वपूर्ण तथ्य । गंगा जल की विशेषता, इसके औषधीय गुणों का रहस्य, अलग काल खण्ड के शासकों की गंगा के प्रति आस्था और वैज्ञानिकों द्वारा गगां जल पर किये शोध अध्ययन का सार।

धर्म ग्रंथों में गंगा माहात्म्य

वेद, पुराण, रामायण, महाभारत आदि सभी हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में गंगा का माहात्म्य और विशेषताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। कूर्म पुराण के अनुसार बलि से वामन अवतार धारी विष्णु ने ढाई गज भू मण्डल मांगा। दूसरा डग ब्रह्म लोक पहुंचा। ब्रह्मा ने श्री हरि के पैरों का प्रछालन किया। इस जल को ब्रह्मा ने कमण्डल में रखा। यही गंगा जल कहलाया।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार शिव की जटाओं से छूटते ही गंगा सात धाराओं में परिवर्तित हुई। जिसमें हादिनी, पावनी, नालनी धाराएं पूर्व दिशा में एवं सुयक्षु, सीता और सिंधु पश्चिम दिशा में और सातवीं धारा ने राजा भगीरथ का अनुसरण किया, जो भागीरथ गंगा कहलाई।
श्रीमद् भागवत पुराण में गंगा के पृथ्वी पर अवतरण का प्रसंग है। त्रेता युग में सूर्यवंशी महाराज सगर का जन्म हुआ। वो राजा बाहुक का पुत्र था।
राजा सगर ने शौर्य और पराक्रम से सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय हासिल की। उसने अश्व मेघ यज्ञ आयोजित करने का निर्णय लिया। इस यज्ञ का घोडा इन्द्र ने कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। घोडे की खोज में पहुंचे सगर पुत्रों ने देखा कि घोडा आश्रम में बंधा है और मुनि साधना में लीन है। इससे
गुस्साये सगर पुत्रों ने कपिल मुनि के साथ दुर्व्यहार किया। क्रोधित मुनि ने सगर पुत्रों को अपने श्राप से भस्म कर दिया। श्राप से सगर के साठ हजार पुत्र राख हो गये।
राजा सगर को जब यह पता चला तो वो कपिल मुनि से क्षमा मांगने उनके आश्रम पहुंचे। अपने पुत्रों के उद्धार का उपाय पूछा। मुनि ने गंगा से उनका उद्धार होने की बात कही। राजा सगर, अंशुमान और भगीरथ तीनों ने ब्रह्म लोक से भू लोक पर गंगा अवतरण के लिये तप किया। राजा सगर और अंशुमान अपने उददेश्यों की पूर्ति में असफल रहे, मगर राजा भगीरथ गंगा को धरा पर लाने में सफल रहा।

गंगा के बारे में वैज्ञानिको का दृष्टिकोण

हिमालय की गिरी कंदराओ से निकली गंगा में कुछ चट्टानें घुलती जाती हैं। इस दौरान इसमें कई जड़ी बूटियां मिलती हैं। जिससे इस जल में औषधीय गुण मिश्रित हो जाते हैं । हर नदी के जल की अपनी जैविक संरचना होती है, जिसमें वह ख़ास तरह के पदार्थ रहते हैं, जो कुछ क़िस्म के जीवाणु को पनपने देते हैं और कुछ को नहीं।
वैज्ञानिको के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि गंगा के पानी में ऐसे जीवाणु हैं जो सड़ाने वाले कीटाणुओं को पनपने नहीं देते, इसलिए पानी लंबे समय तक ख़राब नहीं होता।

वैज्ञानिक कारण

वैज्ञानिक बताते हैं कि हरिद्वार में गोमुख- गंगोत्री से आ रही गंगा के जल की गुणवत्ता पर इसलिए कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह हिमालय पर्वत पर उगी हुई अनेकों जीवनदायनी उपयोगी जड़ी-बूटियों, खनिज पदार्थों और लवणों को स्पर्श करता हुआ आता है।
वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा के जल का ख़राब नहीं होने के कई वैज्ञानिक कारण भी हैं। गंगाजल में बैट्रिया फोस नामक एक बैक्टीरिया पाया जाता है जो पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थों को खाता रहता है।इससे जल की शुद्धता बनी रहती है।
गंगा के पानी में गंधक (सल्फर) की प्रचुर मात्रा मौजूद रहती है; इसलिए भी यह ख़राब नहीं होता। इसके अतिरिक्त कुछ भू-रासायनिक क्रियाएं भी गंगाजल में होती रहती हैं, जिससे इसमें कभी कीड़े पैदा नहीं होते।यही कारण है कि यह पानी सदा पीने योग्य माना गया है। जैसे-जैसे गंगा हरिद्वार से आगे अन्य शहरों की ओर बढ़ती जाती है शहरों, नगर निगमों और खेती-बाड़ी का कूड़ा-करकट तथा औद्योगिक रसायनों का मिश्रण गंगा में डाल दिया जाता है।

गंगा जल सेवन से कई रोगों से मुक्ति

वैज्ञानिक परीक्षणों से पता चला है कि गंगाजल से स्नान करने तथा गंगाजल को पीने से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि गंगा जल के सेवन से हैजा, प्लेग, मलेरिया क्षय, आदि रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।
उत्तराखंड स्थित चार धाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ एवं बदरीनाथ मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जाते हैं । दरअसल कपाट बंद के पीछे की मुख्य वजह विषम भौगोलिक परिस्थितियां हैं। लेकिन जन सामान्य में अवधारणा बन गई है कि इन धामों में मंदिरों के कपाट बंद होने के बाद पूजा अर्चना नहीं होती है। हालांकि शीतकालीन पूजा स्थलों में निरंतर पूजा और अर्चना होती रहती है।
अनादि काल से चली आ रही परंपराएं अक्षुण हैं।

अक्षय तृतीया को खुलते हैं कपाट और गोवर्धन पूजा से देव पूजा

गंगोत्री धाम के कपाट अक्षय तृतीया के दिन श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोले जाते हैं। गंगोत्री धाम में देव पूजा की शुरुआत गोवर्धन पूजा के दिन होती है। इस दिन शुभ मुहूर्त में गंगोत्री मंदिर के कपाट शीतकाल के लिए बंद हो जाते हैं।
मां गंगा की भोग मूर्ति अपने शीतकालीन प्रवास स्थल मुखवा के लिए रवाना होती है। पहले पड़ाव में डोली यात्रा दल मार्कण्डेय में रात्रि प्रवास करती है। भैया दूज के दिन विधि विधान के अनुसार भोग मूर्ति को मुखबा स्थित मंदिर में विराजमान किया जाता है।

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